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Work

वो बेरोज़गार बेटा, जो कहता रहता है कि वो ठीक है

वह हर किसी से कहता है कि वह ठीक है। लेकिन नौकरी की तलाश में बीतता हर दिन उसे थोड़ा और तोड़ रहा है।

Unnoticed Lives Editorial · August 16, 2026 · 10 min read
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1. आज कुछ अलग था

सुबह के सात बज रहे थे।

वह उठ गया था।

जिसे अब न तो सोने का कोई तय समय पता होता था और न ही उठने का। लेकिन आज कुछ अलग था। आज उसे जल्दी उठना था, जैसे उसे कहीं जाना हो।

आँख खुलते ही उसने सबसे पहले अपना लैपटॉप खोला और मेल चेक किया।

एक कंपनी की तरफ़ से मेल आया था।

मेल में इंटरव्यू का पता था, समय था और साथ लेकर आने वाले ज़रूरी कागज़ों की पूरी जानकारी थी।

मेल पढ़ते-पढ़ते उसकी घबराहट बढ़ने लगी।

आज का दिन उसकी महीनों की मेहनत को एक दिशा दे सकता था। या फिर उसे वहीं वापस ला सकता था, जहाँ से वह बार-बार शुरू करता था।

वह नहाया, फिर थोड़ा-सा नाश्ता किया।

मन बिल्कुल नहीं था खाने का, लेकिन माँ जब पूछतीं, “बेटा, खाना खाया है ना?” तो वह इस बार झूठ नहीं बोलना चाहता था। इसलिए उसने नाम भर का खा लिया।

इंटरव्यू के लिए निकलने में अभी थोड़ा समय था। उसने फिर लैपटॉप खोला और कुछ सवाल देखने लगा। कौन-सा सवाल पूछा जा सकता है, उसका जवाब कैसे देना है, क्या नहीं कहना है—वह सब दोबारा देखता रहा।

फिर समय हुआ।

उसने सारे कागज़ संभाले, अपना बैग उठाया और कमरे से बाहर निकल गया।

वह समय पर पहुँच गया।

इंटरव्यू शुरू हुआ।

कुछ देर बाद खत्म भी हो गया।

उन कुछ मिनटों में उसे बहुत कुछ याद आया—माँ का चेहरा, बहन से किया हुआ नया फोन दिलाने का वादा, पिता की बढ़ती उम्र और घर की वे सारी छोटी-बड़ी ज़रूरतें जिनके बारे में वह रोज़ सोचता था।

लेकिन इंटरव्यू का परिणाम फिर उसकी मेहनत और उम्मीद के विपरीत था।

वह बाहर निकला।

तभी उसके फोन पर एक कॉल आया।

माँ का था।

कुछ सेकंड तक वह फोन को देखता रहा। फिर उसने हिम्मत जुटाई और कॉल उठा लिया।

“हाँ माँ।”

वह हँसते हुए बात करने लगा, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

माँ ने पूछा, “क्या हुआ बेटा?”

वह कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला—

“कुछ नहीं माँ। ये सब तो होता रहता है। आज नहीं तो कल नौकरी मिल ही जाएगी।”

और फोन रखने के बाद वह कुछ देर वहीं खड़ा रहा।

अकेला।

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2. “बस चल रहा है”

“नौकरी का क्या हुआ?”

सवाल बहुत छोटा है।

लेकिन जिस इंसान से बार-बार पूछा जाए, उसके लिए इसका वजन बहुत बड़ा हो सकता है।

उसके लिए भी था।

जब भी कोई पूछता कि नौकरी का क्या चल रहा है, उसके पास बस एक जवाब होता—

“बस चल रहा है।”

और अगर कोई थोड़ा और पूछ लेता तो—

“मैं ठीक हूँ।”

इसके आगे वह बोलता भी क्या?

उसे खुद नहीं पता था कि उसकी नौकरी क्यों नहीं लग रही।

उसे यह भी नहीं पता था कि लगेगी तो कब लगेगी।

जो लोग उससे नौकरी के बारे में पूछते थे, उनसे कहीं ज्यादा जल्दी उसे खुद नौकरी पाने की थी।

वह अब थक चुका था।

हर बार वही जवाब देते-देते।

“बस चल रहा है।”

“मैं ठीक हूँ।”

कितनी अजीब बात है।

जिस इंसान के पास खुद के बारे में बताने के लिए कुछ नहीं बचता, वह सबसे ज्यादा यही दो वाक्य बोलता है।

वह अंदर से चाहता था कि एक दिन कोई उससे पूछे—

“क्या कर रहे हो आजकल?”

और उसके पास जवाब हो।

वह बता सके कि वह कहाँ काम करता है।

कितना कमाता है।

क्या सीख रहा है।

किस चीज़ के लिए मेहनत कर रहा है।

जिन लोगों के पास काम है, वे कभी-कभी उसी काम से परेशान होकर उससे दूर भागना चाहते हैं।

लेकिन शायद वे कभी नहीं समझ पाएँगे कि कोई ऐसा भी है जो सिर्फ़ एक नौकरी पाने के लिए हर दिन खुद से लड़ रहा है।

सबसे ज्यादा उसे इस बात का दुख था कि उसे अपने ही घरवालों से बार-बार झूठ बोलना पड़ता था।

उसे बुरा लगता था कि माँ-बाप, भाई-बहन उससे उम्मीद रखते हैं और वह हर बार मुस्कुराकर कह देता है—

“मैं ठीक हूँ।”

जबकि वह ठीक नहीं था।

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3. अब सुबह किसी चीज़ के लिए नहीं होती

एक नई सुबह।

कई लोगों के लिए नई उम्मीद, नई ऊर्जा और एक नई शुरुआत लेकर आती है।

लेकिन कुछ लोगों के लिए सुबह बस कैलेंडर का एक और बदलता हुआ पन्ना होती है।

उसके लिए भी अब यही था।

लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था।

जब वह कॉलेज में था, तब हर सुबह उसके लिए एक उद्देश्य लेकर आती थी।

सुबह उठना।

कॉलेज जाना।

मन लगाकर पढ़ना।

बहुत ज्यादा दोस्ती-यारी नहीं करना।

हर दिन कुछ नया सीखने की कोशिश करना।

कॉलेज से कमरे पर लौटना और फिर उसी जुनून के साथ लैपटॉप खोल लेना।

परीक्षा आने से काफी पहले उसका लगभग हर विषय तैयार हो जाता था।

जब बाकी बच्चे पहली बार किसी विषय को पढ़ रहे होते, तब वह उसका रिविज़न कर रहा होता।

हर पेपर में अच्छे नंबर लाना और पूछे गए सवालों का जवाब देना जैसे उसकी आदत बन गई थी।

उसे शायद बहुत पहले ही समझ आ गया था कि उसके ऊपर जिम्मेदारियाँ आने वाली हैं।

इसीलिए जब बाकी बच्चे पार्टी करते थे, वह अपने कमरे में बैठकर पढ़ता था।

उसके अच्छे नंबर उसके लिए सिर्फ़ नंबर नहीं थे।

वे उसके ऊपर बढ़ती उम्मीदें भी थे।

और वह उन उम्मीदों को पूरा करने के लिए खुद को लगातार बेहतर बनाता रहा।

लेकिन आज उसी लड़के के पास सुबह उठने का कोई उद्देश्य नहीं था।

अलार्म बजता था।

वह बंद कर देता था।

अलार्म का काम पूरा हो जाता था।

लेकिन जिसे उठाना था, उसके अंदर से जैसे उठने की इच्छा ही खत्म हो चुकी थी।

वह दिन का बड़ा हिस्सा अपने बिस्तर पर पड़ा रहता।

माँ को लगता था कि शायद वह ठीक नहीं है।

पिता को लगता था कि वह नौकरी ढूँढ रहा है।

दोनों अपनी-अपनी जगह सही थे।

लेकिन सच किसी को नहीं पता था।

यहाँ तक कि उसे खुद भी नहीं।

वह कुछ करना चाहता था।

बहुत कुछ करना चाहता था।

बस अब वह कर नहीं पा रहा था।

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4. हर “We regret to inform you” थोड़ा और तोड़ता है

वह हर दिन कई नौकरियों के लिए आवेदन करता था।

अपना रिज़्यूमे भेजता।

प्रोफाइल अपडेट करता।

नई कंपनियाँ खोजता।

हर आवेदन के साथ सिर्फ़ एक रिज़्यूमे नहीं जाता था।

उसके साथ उसकी एक उम्मीद भी जाती थी।

कभी बहन के लिए खरीदा जाने वाला नया फोन।

कभी पिता की मदद करने का सपना।

कभी माँ को यह कहने की इच्छा कि अब आपको मेरे लिए चिंता करने की जरूरत नहीं है।

फिर एक दिन उसके मेल में लिखा आता—

**“We regret to inform you…”**

और उन कुछ शब्दों के साथ उसकी कई उम्मीदें एक साथ गिर जातीं।

शायद दुनिया के सबसे मुश्किल कामों में से एक है अपनी उम्मीद को अपने सामने टूटते हुए देखना।

और वह यह काम हर दिन कर रहा था।

हर रिजेक्शन के बाद वह अपने रिज़्यूमे को और बेहतर करने की कोशिश करता।

नई चीज़ें सीखता।

नई जगह आवेदन करता।

फिर इंतज़ार करता।

और फिर वही मेल आता।

पहली बार जब उसे रिजेक्शन मिला था, तब बहुत बुरा लगा था।

अब फर्क इतना था कि दर्द कम नहीं हुआ था।

बस वह दर्द उसका रोज़ का हिस्सा बन गया था।

और सबसे खतरनाक बात यही थी।

उसे अब रिजेक्शन से ज्यादा डर इस बात का लगने लगा था कि शायद किसी दिन उसे “You are selected” लिखा हुआ मेल देखने की उम्मीद ही न रहे।

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5. दोस्त आगे निकल गए

जो दोस्त कल तक उसके साथ क्लास में बैठते थे, हँसी-मज़ाक करते थे, आज उनका फोन आने पर भी वह कई बार फोन नहीं उठा पाता था।

उसे डर लगता था।

अगर उन्होंने पूछ लिया—

“क्या कर रहा है आजकल?”

तो वह क्या जवाब देगा?

किसी की नौकरी लग गई थी।

किसी को प्रमोशन मिल गया था।

किसी ने अपने पिता का बिज़नेस संभाल लिया था।

और वह?

वह अभी भी वहीं था।

उसे किसी से जलन नहीं थी।

वह अपने दोस्तों की सफलता से खुश था।

बस एक डर था।

कि कहीं वह सबसे बहुत पीछे न छूट जाए।

और सबसे डरावनी बात यह थी कि यह डर उसे हर दिन सच होता हुआ दिखाई दे रहा था।

जब उसे पता चलता कि उसका कोई दोस्त अपने सपने पूरे कर रहा है, तो वह उसे बधाई देना चाहता।

लेकिन कई बार हिम्मत नहीं जुटा पाता।

क्योंकि उसे लगता था कि उसके दोस्तों को शायद उस पर भरोसा था।

घरवालों को भरोसा था।

शिक्षकों को भरोसा था।

और अब उसे लगता था कि वह उन सभी उम्मीदों के नीचे दब चुका है।

वह चाहता था कि उसके दोस्त उसे भूल जाएँ।

उसके कॉलेज के शिक्षक उसे भूल जाएँ।

वह हर उस जगह से गायब हो जाना चाहता था जहाँ लोग उसे उसके पुराने रूप में जानते थे।

उस लड़के के रूप में जो हमेशा अच्छा करता था।

जो समय पर काम पूरा करता था।

जिससे सभी को उम्मीद थी कि वह कुछ बड़ा करेगा।

उसे डर था कि अब सबको पता चल जाएगा—

कि वह वैसा नहीं कर पाया।

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6. घर में कोई कुछ नहीं कहता

पिता उससे नौकरी के बारे में बहुत ज्यादा नहीं पूछते थे।

शायद इसलिए कि उन्हें अपने बेटे पर भरोसा था।

या शायद इसलिए कि वे उस पर और दबाव नहीं डालना चाहते थे।

लेकिन वह पहले ही दबाव में दब चुका था।

बस उस दबाव को किसी ने उसके सामने शब्दों में नहीं रखा था।

वह दबाव था पिता की चुप्पी का।

उस चुप्पी में उसे जैसे यह सुनाई देता था—

“मेरा बेटा कुछ न कुछ कर लेगा।”

“वह अपने पैरों पर खड़ा हो जाएगा।”

“वह हमारी उम्मीद पूरी करेगा।”

पिता उसे कभी बेइज़्ज़त नहीं करते थे।

न ही रोज़ नौकरी के लिए पूछते थे।

बल्कि जब महीने का खर्च निकालते, तो उसके लिए भी कुछ पैसे अलग रख देते।

“रख ले, जरूरत पड़े तो काम आएँगे।”

वह पैसे ले लेता।

लेकिन हर बार उसके अंदर कुछ और भारी हो जाता।

कभी-कभी बुरी बातें ही हमें नहीं तोड़तीं।

अच्छी बातें भी तोड़ देती हैं।

क्योंकि उन अच्छी बातों को देखते हुए वह मन ही मन सोचता—

**“सब मेरे लिए इतना कुछ कर रहे हैं और मैं अपने लिए भी कुछ नहीं कर पा रहा।”**

माँ को नौकरी की दुनिया के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था।

उन्हें यह नहीं पता था कि उसने कितनी कंपनियों में आवेदन किया।

कितने इंटरव्यू दिए।

कितनी बार रिजेक्ट हुआ।

उन्हें बस इतना पता था कि उनके बेटे ने खाना खाया या नहीं।

खाना बनते ही वह उसे बुला लेतीं।

और जब उन्हें लगता कि उनका बेटा ठीक नहीं है, तो कभी-कभी खुद उसके कमरे में जाकर अपने हाथों से खिला देतीं।

“कुछ हुआ है क्या?”

माँ कई बार पूछतीं।

और वह हर बार कहता—

“नहीं माँ।”

फिर थोड़ी देर रुककर कहता—

“हो जाएगा।”

---

7. जिस दिन उसने सच बोलना चाहा

एक दिन कुछ रिश्तेदार घर आए।

बातों-बातों में उन्होंने पूछा—

“वो कहाँ है?”

माँ ने उसे कमरे से बुलाया।

वह बाहर आया।

कुछ देर हाल-चाल पूछा गया।

फिर वही सवाल आया।

“बेटा, नौकरी का क्या हो रहा है?”

और उसके बाद—

“कब तक ऐसे बैठे रहोगे?”

बस इतना ही कहा था उन्होंने।

लेकिन शायद उसके अंदर यह बात सुनने की ताकत बहुत पहले खत्म हो चुकी थी।

वह बिना कुछ बोले अपने कमरे में चला गया।

आँखों से आँसू निकलने लगे।

माँ उसके पीछे कमरे में आ गईं।

आज वह पहली बार कहना चाहता था कि वह ठीक नहीं है।

लेकिन शब्द उसके गले में अटक गए।

बहुत देर तक वह चुप बैठा रहा।

फिर उसने किसी तरह हिम्मत जुटाई।

“माँ…”

आवाज़ काँप रही थी।

“मैं डर गया हूँ।”

माँ चुप रहीं।

“मुझे डर लगता है कि कहीं मुझे नौकरी नहीं मिली तो?”

वह रोते हुए बोलता गया।

“मुझे डर लगता है कि कहीं मैं आपके और पापा के पैसे बर्बाद तो नहीं कर रहा।”

“मुझे डर लगता है कि कहीं मैं अपने दोस्तों से बहुत पीछे तो नहीं रह गया।”

“मुझे डर लगता है कि कहीं मैं कुछ बन ही नहीं पाया तो?”

माँ कुछ नहीं बोलीं।

वह बस सुनती रहीं।

पहली बार बेटे ने उनसे नौकरी के बारे में नहीं, अपने डर के बारे में बात की थी।

और शायद पहली बार उसे यह महसूस हुआ कि उसे हर सवाल का जवाब देना जरूरी नहीं है।

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8. शायद ठीक होना, नौकरी मिलने के बाद शुरू नहीं होता

अगली सुबह बहुत कुछ नहीं बदला।

न तो उसे नौकरी मिल गई।

न कोई नया ऑफर आया।

न उसके सारे रिजेक्शन अचानक खत्म हुए।

बदला तो बस एक छोटी-सी चीज़।

सुबह उठकर उसने अपना लैपटॉप खोला।

अपना रिज़्यूमे खोला।

जरूरत के हिसाब से उसे थोड़ा बदला।

एक जगह आवेदन किया।

फिर दूसरी जगह।

फिर उसने लैपटॉप बंद कर दिया।

और पहली बार काफी समय बाद वह बाहर टहलने के लिए निकल गया।

ऐसा नहीं था कि सब कुछ जादू की तरह ठीक हो गया था।

उसके डर अभी भी थे।

नौकरी की चिंता अभी भी थी।

रिजेक्शन का डर भी था।

लेकिन उसके अंदर एक छोटी-सी बात बदल गई थी।

उसे समझ आने लगा था कि उसकी कीमत किसी नौकरी से तय नहीं होती।

नौकरी उसके जीवन का एक हिस्सा हो सकती है।

उसकी पूरी पहचान नहीं।

अब जब कोई उससे पूछता—

“नौकरी का क्या हो रहा है?”

तो वह झूठ नहीं बोलता।

वह मुस्कुराकर कहता—

“मुश्किल है।”

फिर थोड़ी देर रुककर कहता—

“लेकिन मैं कर रहा हूँ।”

शायद ठीक होना हमेशा उस दिन से शुरू नहीं होता जिस दिन हमें नौकरी मिलती है।

कभी-कभी ठीक होना उस दिन से शुरू होता है,

जिस दिन हम पहली बार किसी से कहते हैं—

**“मैं ठीक नहीं हूँ।”**

और फिर अगली सुबह उठकर,

धीरे-धीरे,

फिर से कोशिश करते हैं।