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वो माँ, जो भूल गई थी कि वो क्या चाहती थी

वो सबकी जरूरतें जानती है। लेकिन कहीं न कहीं, उसने खुद से पूछना ही छोड़ दिया कि उसे क्या चाहिए।

Unnoticedlives Editorial · August 14, 2026 · 10 min read
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अभी सुबह के चार बज रहे हैं।

घर के सारे लोग अपने-अपने कमरों में सो रहे हैं। अभी सूर्य को भी जागने में समय है। पर कोई है, जो उनसे पहले ही उठ गया है।

जिसका नींद और आराम से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है।

उन्हें देखकर ऐसा लगता है जैसे रात दूसरों के लिए होती है और आराम भी दूसरों के लिए ही बना है।

वो उठते ही सबसे पहले घर के कमरों में जाकर देखती हैं कि सब आराम से सो रहे हैं या नहीं। फिर अपने दिन के काम की शुरुआत करती हैं, ये सोचकर कि आज खाने में क्या बनाना है।

किसको क्या पसंद है, किसको क्या पसंद नहीं है—उन्हें सब पता है।

पर उन्हें क्या पसंद है, ये तो वो बहुत पहले भूल गई थीं।

सुबह की चाय बनाना, फिर किसको कितने बजे उठाना है उसका गणित लगाना। बच्चों की आदतों को जानते हुए वो समय थोड़ा ज्यादा बताकर, प्यार से सबको उठाती हैं।

बच्चे समय देखने के बाद उनसे कुछ कहें नहीं, इसलिए वो वहाँ से चुपचाप निकल जाती हैं और अपने काम में लग जाती हैं।

काम करते हुए भी उन्हें वो गणित याद रहता है—कौन उठ गया, कौन अभी तक नहीं उठा, किसे कितनी बार आवाज़ लगानी पड़ेगी।

सबकी पसंद का ध्यान रखते हुए वो खाना बनाती हैं। सबके टिफिन तैयार करती हैं। फिर सबको नाश्ते के लिए बुलाकर खाना खिलाती हैं।

सब लोग खाना खाकर अपने-अपने काम के लिए निकल जाते हैं।

इतना सब करने में उन्हें ये तक याद नहीं रहता कि भूख उन्हें भी लगती है।

सूर्य सिर पर आ गया है, पर उन्होंने अभी तक खाना नहीं खाया।

क्यों?

क्योंकि अभी बाकी काम खत्म नहीं हुआ है।

और जब बाकी का काम खत्म होता है, तब उन्हें वो थोड़ा-सा खाली समय मिलता है जिसमें वो खाना खाती हैं।

फिर बच्चों के इंतज़ार में बैठ जाती हैं।

हालाँकि उनके आने से पहले ही वो सबके लिए गरम-गरम खाना बना चुकी हैं, ताकि उनके बच्चे घर आएँ तो उन्हें ठंडा खाना न खाना पड़े।

बच्चे आते हैं, हाथ-मुँह धोते हैं और खाना खाने बैठ जाते हैं।

खाते-खाते कभी उन्हें याद आता है कि माँ ने खाना खाया या नहीं।

पूछने पर वो कह देती हैं—हाँ, खा लिया।

पर कितना खाया, ये न कोई पूछता है, न वो बताती हैं।

थोड़ी देर बच्चों से बात करने के बाद वो शाम की चाय बनाने में लग जाती हैं।

चाय खत्म होती है तो उन्हें याद आता है कि रात के खाने में क्या बनाना है।

वो फिर उसी काम में लग जाती हैं।

पति के काम से लौटने के बाद उन्हें खाना देना, उनका हाल-चाल पूछना और फिर सबको सुलाना।

सब सो जाते हैं।

वो अभी नहीं सोई हैं।

अभी तो उन्हें ये सोचना है कि अगले दिन क्या बनाना है।

उन्हें देखकर कभी ऐसा लगता ही नहीं कि माँ बनने से पहले वो कुछ और भी रही होंगी।

अपने बच्चों और पति में उन्होंने खुद को इतना झोंक दिया है कि उनकी अपनी दुनिया धीरे-धीरे छोटी होती चली गई।

अब उनकी दुनिया में बस कुछ लोग दिखाई देते हैं—उनके बच्चे और उनके पति।

बस, जैसे उनकी दुनिया वहीं खत्म हो जाती है।

कभी उनसे पूछकर देखिए—मम्मी, तुम शादी से पहले कैसी थीं?

तुम्हारे सपने क्या थे?

वो ऐसे सोचने लगती हैं जैसे ये किसी पिछले जन्म की बात हो।

इस जन्म में तो वो पैदा होने के बाद से अब तक बस एक माँ और पत्नी रही हैं।

कभी-कभी बातों में वो हमें बताती हैं कि शादी से पहले उन्हें क्या खाना पसंद था। कौन-से खेल खेलती थीं। नाना-नानी, मौसी और मामा कैसे रहते थे।

उन बातों को सुनते हुए कभी-कभी मन में सवाल आता है—क्या वो कभी कुछ और भी चाहती थीं?

क्या वो कभी काम करना चाहती थीं?

क्या वो आगे पढ़ना चाहती थीं?

क्या वो कहीं घूमना चाहती थीं?

या शायद बस अपने लिए थोड़ा-सा समय चाहती थीं?

इन सवालों के जवाब शायद हमें कभी न मिलें।

क्योंकि हमने उनसे पूछने में बहुत देर कर दी।

कभी-कभी ऐसा भी होता है कि साल में रक्षाबंधन न पड़े, तो वो अपने भाई से मिलने तक नहीं जा पातीं।

और फिर जब वो कभी नाचती हैं, सिलाई करती हैं या किसी पुरानी पसंद की चीज़ में खो जाती हैं, तो उन्हें देखकर लगता है—शायद उनके भी कुछ सपने रहे होंगे।

जब उनकी शादी हुई होगी, तब शायद उनके मन में भी ये आया होगा कि सपनों का क्या है—उन्हें पति के थोड़ा संभल जाने के बाद भी पूरा किया जा सकता है।

फिर वो अपने काम में लग गईं।

पति के पैरों पर ठीक से खड़े होने से पहले ही उन्हें एक और जिम्मेदारी मिल गई।

उनके गर्भ में उनका आने वाला कल था, जो उनके आज को पूरी तरह बदलने वाला था।

अब घर के सारे काम, पति की देखभाल और धीरे-धीरे बच्चे की जिम्मेदारी—सब कुछ उनकी जिंदगी का हिस्सा बनता चला गया।

उन्होंने सब किया।

और करते-करते उनका अपना सपना थोड़ा धुंधला होता गया।

फिर वो दिन आया जब वो माँ बनीं।

उन्हें वो आराम कभी नहीं मिला, जो शायद उन्हें मिलना चाहिए था।

फिर भी उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी।

और जब कभी उन्हें अपना सपना याद आता होगा, तो शायद वो खुद से कहती होंगी—बच्चा थोड़ा बड़ा हो जाए।

फिर—घर की चीज़ें थोड़ी ठीक हो जाएँ।

फिर—अभी पैसे की जरूरत है।

और फिर—बाद में कर लेंगे।

वो पैसे जोड़ती रहीं।

पति को जरूरत होती तो अपने बचाए हुए पैसे उन्हें दे देतीं।

बच्चों के लिए पैसे बचाती रहीं।

लेकिन अपने लिए उन पैसों से शायद ही कभी कुछ खरीदा।

बच्चे बड़े होते गए।

उनकी जिम्मेदारियाँ भी बड़ी होती गईं।

और जो सपने कभी बस थोड़े धुंधले हुए थे, धीरे-धीरे इतने दूर चले गए कि उन्हें वापस देखना भी मुश्किल हो गया।

ये सारी चीज़ें एक के बाद एक होती जाती हैं।

और उनके साथ-साथ वो खुद को भी उसी तरह बदलती जाती हैं।

एक समय ऐसा आता है जब पति अच्छी नौकरी पर काम कर रहे होते हैं।

बच्चे बड़े होकर अपनी जिम्मेदारियाँ उठाने के काबिल हो चुके होते हैं।

अब शायद उनके पास पहले से ज्यादा समय भी है।

लेकिन इतने वर्षों में किसी ने एक बार भी ठीक से नहीं पूछा—माँ, तुम्हें कुछ चाहिए?

या—माँ, तुम्हारी कोई ख्वाहिश है?

और जब वो हमेशा की तरह जवाब देती हैं—नहीं, मुझे कुछ नहीं चाहिए।

तो बाकी लोग उसे सच मान लेते हैं।

सबको लगने लगता है कि उस औरत के कोई सपने नहीं हैं।

शायद इसमें किसी एक की गलती नहीं है।

जब उनके सपने उन्हें खुद याद थे, तब किसी ने उनसे पूछा नहीं।

और जब किसी ने पूछना शुरू किया, तब तक वो एक के बाद एक जिम्मेदारी निभाती चली गई थीं और अपने सपनों को पीछे करती चली गई थीं।

जब तक कोई पूछने वाला आया, तब तक उनका आरंभ और अंत उनका परिवार बन चुका था।

सपने कभी एक साथ नहीं मरते।

वो एक-एक करके मरते हैं।

और उसका दुख सिर्फ वही इंसान जानता है जिसके सपने मर रहे होते हैं।

बाकी लोगों को तो पता भी नहीं चलता कि कुछ मर रहा है।

हम अपनी माँ में उस छुपी हुई औरत को देख ही नहीं पाते, जिसके अपने भी सपने हो सकते हैं।

हम उसमें बस माँ को देखते हैं।

जब कोई परेशानी आती है—माँ, ये हो रहा है, कुछ करो ना।

माँ, मेरा ये काम कर दो।

माँ, वो कहाँ रखा है?

माँ, खाना बना दो।

हमारी जिंदगी में माँ अक्सर उन सवालों का जवाब बनकर रह जाती है, जिनके बारे में हमने कभी सोचा ही नहीं कि उसके अपने सवाल क्या हैं।

हम ये क्यों मान लेते हैं कि माँ बनने के लिए अपनी इच्छाओं का गला घोंटना जरूरी है?

हम भूल जाते हैं कि उनकी भी तो ये पहली जिंदगी है।

उनके साथ भी बहुत कुछ पहली बार हुआ होगा।

उन्होंने भी बहुत कुछ पहली बार देखा होगा।

वो भी कुछ देखना चाहती होंगी।

कुछ करना चाहती होंगी।

कुछ बनना चाहती होंगी।

या शायद अब भी कुछ चाहती होंगी।

हम भूल गए हैं कि माँ या पत्नी बनने का अर्थ ये नहीं है कि इंसान अपने आप को भूल जाए और अपने परिवार को अपना सबकुछ बना ले।

वो माँ हैं।

लेकिन माँ होने से पहले और माँ होने के साथ-साथ, वो एक इंसान भी हैं।

और शायद उस इंसान की भी कुछ इच्छाएँ हैं।

कल फिर वो सबके उठने से पहले उठेंगी।

सारे काम फिर वैसे ही करेंगी, जैसे हमेशा से करती आई हैं।

सबके सोने के बाद सोएँगी।

एक जिम्मेदारी के नाम पर अपनी जिंदगी जीती चली जाएँगी।

उन्हें देखकर लगता है जैसे नींद और आराम उनके लिए कभी बनाए ही नहीं गए थे।

उनके लिए शायद बहुत कुछ नहीं बदलेगा।

बदलेंगे तो बस दिन, तारीखें और साल।

वो वैसी ही रहेंगी।

हाँ, चेहरे पर कुछ झुर्रियाँ जरूर आ जाएँगी—उनके परिश्रम, उनकी थकान और उन तमाम वर्षों का एक छोटा-सा चित्र बनकर।

शायद चीज़ें कभी बदलें।

शायद उनकी जिंदगी में भी वो दिन आए, जब उनसे ये न पूछा जाए—तुम्हें क्या चाहिए?

बल्कि पूछा जाए—तुम्हारा मन क्या चाहता है?

दोनों सवालों के बीच अंतर बहुत छोटा है।

लेकिन शायद—यही छोटा-सा अंतर किसी की पूरी जिंदगी बदलने की शुरुआत हो सकता है।

A question worth carrying

When was the last time you asked someone what they wanted — without asking what they wanted for everyone else?