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जो कोई नहीं पूछता

शायद उसके लिए शाम के पाँच बजे अब सिर्फ पाँच बजे नहीं रहे होंगे

एक पिता को सड़क पर अपने ही बेटे से गालियाँ खाते देखा। उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं था, सिर्फ एक ऐसी बेबसी थी जिसे शायद वह बहुत समय से अपने साथ लिए घूम रहा था।

Unnoticed Lives Editorial · September 9, 2026 · 3 min read
Family
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एक कमरे में चार लोग रहते हैं—माँ, बाप, बेटा और उसकी पत्नी।

उनके रहने का पता शायद ही किसी को चलता हो। कमरे के बाहर फैले कुछ कपड़ों से ही अंदाज़ा होता है कि वहाँ कोई रहता है। बाकी सब कुछ इतना शांत रहता है कि लगता है जैसे कमरा खाली हो।

लेकिन कभी-कभी अचानक इतनी तेज़ आवाज़ें आती हैं कि पूरी गली सुन लेती है।

कई दिनों तक उन आवाज़ों को सुनने के बाद एक दिन समझ आया कि चिल्लाने वाला उनका बेटा है और सुनने वाले उसके माँ-बाप और पत्नी।

वह सुबह करीब नौ बजे काम पर जाता है और शाम को लौटता है। लौटने के बाद हाथ में शराब की बोतल लेकर बालकनी में बैठ जाता है। नशा चढ़ने के बाद उसकी आवाज़ पूरे घर में फैलने लगती है।

कभी गालियाँ।

कभी चीखना।

कभी मारपीट की आवाज़।

एक दिन उसे ऑफिस से घर जाते हुए रास्ते में उसके माँ-बाप मिल गए।

वह वहीं सड़क पर खड़ा होकर उन्हें गालियाँ देने लगा और घर से निकल जाने को कहने लगा।

बेटे के चेहरे पर गुस्सा था।

पिता के चेहरे पर सिर्फ बेबसी।

उस दिन उसके चेहरे को देखकर लगा—शायद बेबसी भी धीरे-धीरे चेहरे पर रहने लगती है।

पिता की उम्र करीब पचपन-साठ साल होगी। वह घर पर ही रहता है।

पता नहीं उस दिन गालियाँ सुनते हुए उसके मन में क्या चल रहा होगा।

क्या वह अपने बेटे को देखकर कभी सोचता होगा कि यह वही बच्चा है जिसे उसने कभी गोद में उठाया था?

क्या वह कभी पीछे जाकर देखता होगा कि उसका घर यहाँ तक कैसे पहुँचा?

क्या वह सोचता होगा कि उससे कहाँ गलती हुई?

या शायद अब वह कुछ सोचता ही नहीं होगा।

शायद वह सिर्फ शाम के पाँच बजने का इंतज़ार करता होगा।

और पाँच बजते ही मन में एक हल्का-सा डर उतर आता होगा।

शायद वह अपने बेटे से आँखें मिलाने से बचता होगा।

शायद उसे अपने बेटे से ज्यादा अपनी बहू की चिंता होती होगी।

वह लड़की, जो इस घर में आई थी, उसने इस घर के बारे में क्या सोचा होगा?

क्या वह भी कभी सोचती होगी कि उसकी आगे की जिंदगी कैसी होगी?

और उस पिता के मन में शायद एक छोटी-सी इच्छा अब भी कहीं बची होगी—

कि उसका बेटा एक दिन अच्छा बेटा बन जाए।

उसकी देखभाल करे।

उससे बात करते हुए उसे डरना न पड़े।

हम नहीं जानते उस घर में पिछले कुछ सालों में क्या हुआ होगा।

क्या बिगड़ा, कब बिगड़ा, और कहाँ से बिगड़ा—यह सब हम नहीं जानते।

हमने बस उस दिन सड़क पर एक पिता को अपने बेटे से गालियाँ सुनते देखा था।

और उसके चेहरे पर एक ऐसा सवाल देखा, जिसका जवाब शायद वह खुद भी बहुत समय से ढूँढ़ रहा है—

घर आखिर कब अपना रहना बंद कर देता है?