जो कोई नहीं पूछता
रिक्शे में सोता हुआ बच्चा
स्कूल की छुट्टी, थके हुए बच्चों से भरा रिक्शा, और एक कोने में सो गया एक छोटा लड़का। बिना कुछ कहे, बिना कुछ मांगे, हर किसी ने उसकी नींद का ख्याल रखा — रिक्शे वाले ने भी, बगल बैठी लड़की ने भी। एक छोटी-सी यात्रा, जो इंसानियत की सबसे शांत शक्ल दिखा जाती है।
दोपहर के डेढ़ बजे थे। स्कूल की छुट्टी हो चुकी थी, और गली के मोड़ पर हमेशा की तरह भीड़ लगी थी — रिक्शे, वैन, साइकिलें, हर तरफ बच्चों की चीख-पुकार और अभिभावकों की आवाज़ें।
रिक्शे वाला रामलाल हर रोज़ इसी वक्त यहां खड़ा होता। सात बच्चे उसकी सवारी में — बैग गोद में, पानी की बोतलें गले में लटकी हुई, यूनिफॉर्म पर धूल के निशान, जूतों के फीते आधे खुले।
सबसे कोने में, खिड़की के पास, एक छोटा लड़का बैठा था — शायद पहली या दूसरी क्लास का। दिन भर की मेहनत — पढ़ाई, खेल का पीरियड, दोपहर की गर्मी — सब मिलकर उसे थका चुके थे।
रिक्शा चलना शुरू हुआ। पहले मोड़ तक वो जागा हुआ था, खिड़की से बाहर देख रहा था। दूसरे मोड़ तक उसकी आँखें झपकने लगीं। तीसरे मोड़ तक, वो सो चुका था — सिर रिक्शे की सरिये पर टिका, मुंह हल्का खुला, बैग सीने से चिपकाए हुए, जैसे कोई खज़ाना हो जिसे कोई छीन न ले।
बगल में बैठी लड़की, शायद उसकी सहपाठी, उसे देखकर मुस्कुराई। उसने अपना दुपट्टा जैसा छोटा स्कार्फ हल्के से उसके सिर के नीचे खिसका दिया, ताकि सरिया चुभे नहीं। फिर उसने धीरे से उसका सिर अपने कंधे पर टिका दिया — बिना कुछ कहे, बिना उसे जगाए, जैसे यह सबसे स्वाभाविक काम हो।
रिक्शा एक गड्ढे से उछला। बच्चा हल्का हिला, भौंहें थोड़ी सिकुड़ीं, पर आँखें नहीं खुलीं। बगल वाली लड़की ने अपना हाथ हल्के से उसकी पीठ पर रख दिया, जैसे कोई माँ अपने बच्चे को सुलाते वक्त थपकी देती है।
बाकी बच्चे अपनी बातों में मशगूल थे — किसी टीचर की शिकायत, किसी खेल की योजना, किसी के टिफिन में क्या था। किसी ने भी सोते हुए बच्चे को छेड़ने की कोशिश नहीं की। किसी ने ज़ोर से बात नहीं की। जैसे बिना कहे, सबने तय कर लिया हो कि इस नींद को जगाना नहीं है।
रामलाल ने पीछे मुड़कर देखा, आईने में। उसने हल्के से रिक्शे की रफ़्तार कम कर दी, ताकि झटके कम लगें। उसने भी कुछ नहीं कहा। बस, अपनी रफ़्तार धीमी की, और आगे बढ़ता रहा।
गली खत्म होने से पहले, एक-एक करके बच्चे उतरने लगे — "बाय!", "कल मिलते हैं!", दरवाज़ों की आवाज़ें, माँओं की आवाज़ें जो अपने बच्चों को बुला रही थीं।
आखिर में सिर्फ वो सोता हुआ बच्चा और वो लड़की बची। उसका घर आ गया। उसने बहुत धीरे से उसे जगाया — "उठो, तुम्हारा घर आ गया।"
बच्चे ने आँखें खोलीं, कुछ पल के लिए उलझन में रहा कि वो कहां है, फिर मुस्कुराया, धन्यवाद जैसा कुछ बुदबुदाया, और बैग उठाकर उतर गया, अभी भी नींद में डूबा हुआ।
लड़की ने उसे जाते हुए देखा, फिर खिड़की से बाहर देखने लगी, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
कभी-कभी दुनिया की सबसे शांत जगहें वो नहीं होतीं, जहाँ कोई शोर नहीं होता — बल्कि वो होती हैं, जहाँ किसी और की नींद को, किसी और की थकान को, बिना कुछ कहे, सम्मान दिया जाता है। जहाँ अजनबी लोग भी, बिना किसी वजह के, एक-दूसरे का ख्याल रख लेते हैं — बस इसलिए, क्योंकि इंसान होने का यही मतलब है।